Tuesday, July 5, 2022
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इस साल अब और कम नहीं होगी ब्याज दरें, RBI के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है

इस साल अक्टूबर में नौतनवा महीना रहा, जब महंगाई दर आरबीआई द्वारा तय की गई 2-6 फीसदी की दर से ज्यादा हो रही थी।

इस साल अक्टूबर में नौतनवा महीना रहा, जब महंगाई दर आरबीआई द्वारा तय की गई 2-6 फीसदी की दर से ज्यादा हो रही थी। 2020 में अब तक केवल मार्च ही ऐसा महीना रहा है, जब महंगाई दर 6 प्रति से कम रही है। किसी सामान्य वर्ष में RBI ने अब तक नीतिगत ब्याज दरों में वृद्धि कर दी है, क्योंकि वैधानिक रूप से वह महंगाई दर को 2 से 6 प्रति के दायरे में रखने के लिए बाध्य होता है। लेकिन, वित्त वर्ष 2021 सामान्य वर्ष नहीं है। अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में देश की अर्थव्यस्था में 10 प्रति की संकुचन आयागी।फरवरी में ब्याज के आधार पर 50 आधार अंक कम किए जाने की उम्मीद है
फल फॉर्म, अर्थशास्त्री (अर्थशास्त्रियों) इस बात की उम्मीद लगा रहे हैं कि RBI फरवरी में एक बार फिर नीतिगत ब्याज दरों (नीतिगत दरों) में कटौती करेगा। नोमुरा के एक एनलिस्ट का कहना है कि हमारा अनुमान है कि 5 दिसंबर को होने वाली बैठक में आबी मुद्रास्फिति को देखते हुए ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा।

हालांकि, निगेटिव आइटम गैप की वजह से मुद्रास्फिति मध्यम स्तर पर आ सकता है। ऐसे में हम फरवरी की बैठक में नीतिगत ब्याज दरों में 50 आधार अंकों की कटौती की उम्मीद कर सकते हैं।

वर्तमान में रेपो रेट 4 प्रति पर है। ऐसे में फरवरी में यदि 50 आधार अंक की कटौती होती है तो यह 3.5 प्रति के स्तर पर आ जाएगा। लेकिन, एक बात यह भी ध्यान देने की होगी कि अगर मुख्य खपत पटरी पर नहीं लौटता है तो मौद्रिक नीतियों में ढील की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

फ्लिप महंगाई दर में इजाफे का अर्थ क्या है?

फ्लिप महंगाई दर में इजाफे का मतलब है कि पैसे बचाने से लेकर खर्च करने वाले, सभी को परेशानी होगी। अर्थशास्त्रियों ने पहले ही चेतावनी दी है कि बचत करने वाले लोगों के लिए ब्याज दर में मदद साबित नहीं हो रही है। मौजूदा महामारी में उन्हे नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सतर्कता बरतते हुए लोग अब हाउसहोल्ड सेविंग्स का उपाय कर रहे हैं। अप्रैल-जुलाई तिमाही में यह 21.6 प्रतिशत बढ़ा है।

नवंबर बुलेटिन में केंद्रीय बैंक ने अर्थव्यवस्था में रिकवरी के लिहाज से मुद्रास्फिति को एक विकट जोखिम करार दिया है। बुलेटिन में लिखा गया, ‘कीमतों में दबाव का सामान्यीकरण एक गंभीर पैदा कर सकता है। मुद्रास्फिति को अधिक नहीं होने का अनुमान नीतिगत हस्तक्षेपों की विश्वसनीयता के लिए ठीक नहीं होगा। इसका असर ग्राउंडथ पर भी नजर आता है