Friday, October 7, 2022
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‘सरकारी नौकरी’ बनेगी चुनाव की चुनौती

मुलायम सिंह ने इसकी शुरुआत की थी। उनकी पार्टी के घोषणापत्र में कहा गया था कि सत्ता में आने पर वह बेरोजगार युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देंगे

एक जब था जब बेरोजगारी भट्ट मुद्दा बना था। यूपी में मुलायम सिंह यादव ने इसकी शुरुआत की थी। उनकी पार्टी के घोषणापत्र में कहा गया था कि सत्ता में आने पर वह बेरोजगार युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देंगे। यह राशि दो हजार रुपये महीने की हुई थी। यह घोषणा युवाओं के बीच खासे आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी और उस साल के चुनाव में समाजवादी पार्टी को मिली बढ़त में बेरोजगारी भत्ते का बहुत बड़ा योगदान माना गया था। इस योजना के असर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2012 के चुनाव अभियान के दौरान ही रोजगार केंद्रों पर अपना नाम दर्ज कराने के लिए युवाओं की लंबी-लंबी कतारें लगने लगी थीं।

तमाम दूसरे हिस्सों ने पहले ‘बेरोजगारी भट्ट’ के कॉन्सेप्ट का विरोध किया था। तर्क यह था कि समाजवादी पार्टी का यह कदम युवाओं को निठल्ला बनाएगा, क्योंकि बैठे-बिठाए जब युवाओं को सरकारी खजाने से दो हजार रुपये महीने मिलने लगेंगे, तो फिर रोजगार तलाशने की उनकी इच्छा स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी। लेकिन बाद में देखा गया कि जिन पक्षों ने इसका विरोध किया था, उन्होंने खुद अलग-अलग राज्यों में इसी फॉर्म्युले को अपनाया। पक्षों को लगने लगा था कि यह एक जिताऊ फ़ॉर्म्युला है, साथ ही इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं है। अगर नौकरियों की बात की होती है, तो नौकरी पैदा करनी पड़ती है, लेकिन बेरोजगारी भट्ट के लिए तो अपनी तरफ से कोई कोशिश ही नहीं करनी चाहिए। सत्ता में आने पर सरकारी खजाने से रोजगार केंद्रों में दर्ज युवाओं को बेरोजगारी भट बांट देना है। यह बात दीगर है कि बाद के दिनों में युवाओं के बीच बेरोजगारी भट्ट ने भी आकर्षण खो दिया और उसकी जगह मुफ्त लैपटॉप, स्मार्ट फोन और वाई-फाई जैसी घोषणाओं ने ले ली।

अजेंडे का मोड़
यह संदर्भ इसलिए कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आज (10 नवंबर को) आ रहे हैं। अगर ये नतीजे एग्जिट पोल के नतीजों के अनुरूप हुए, तो बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बननी तय है। तेजस्वी यादव की इस कामयाबी के पीछे जिस फैक्टर को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है, वह दस लाख सरकारी नौकरियों का वादा है। ऐसा कहा जा रहा है कि तेजस्वी के इस वादे ने जादू जैसा काम किया है। निराश युवाओं में नई उम्मीद जगाई और तमाम पूर्वाग्रहों को लांघते हुए उन्होंने तेजस्वी के साथ अपने को खड़ा किया। ऐसा नहीं है कि बेरोजगारी पहले कभी नहीं रही, लेकिन पिछले कुछ सालों में रोजगार के अवसर सीमित होते चले गए और कई अलग-अलग डेवलपर में यह बात सामने आई कि भारत में इस वक्त बेरोजगारी की दर शिखर पर है।

सही गतिविधियों को कोरोना ने पूरी तरह से किया। बड़ी तादाद में लोगों की सुरक्षा छूट गई और मंदी का जो माहौल बना, उसमें वर्तमान में रोजगार के नए अवसर आने की संभावनाएं भी न्यूनतम हो गई हैं। ऐसे में सरकारी नौकरियों का वादा ख्वाब के हकीकत में बदलने जैसा हो गया है। सरकारी नौकरी तो युवाओं की हमेशा से ही पहली पसंद रही है। एक सामान्य सी धारणा है कि सरकारी नौकरी व्यक्ति को हमेशा सुरक्षित क्षेत्र में रखता है, किसी भी तरह की स्थितियां आ जाती हैं कम से कम नौकरी नहीं।]चुनाव प्रचार के दौरान जब युवाओं से यह पूछा जा रहा था कि तेजस्वी के सरकारी नौकरियों के वादे पर वे क्यों भरोसा कर रहे हैं, तो उनमें से कई का जवाब यह होता था कि अगर वह वादा पूरा नहीं करेंगे तो हम अब भी बेरोजगार हैं, तब भी बेरोजगारी ही रहेगी। हमारे पास खोलने का जोखिम कुछ भी नहीं है, लेकिन अगर उन्होंने अपना वादा पूरा कर दिया तो एक अवसर तो होगा ही सरकारी नौकरी पाने का। इसी उम्मीद पर बिहार के युवाओं ने बेरोजगारी भट्ट पाने की कोई इच्छा भी जाहिर नहीं की।

दूसरे राज्यों तक असर
अगर तेजस्वी यादव बिहार की सत्ता तक पहुंचते हैं तो अपने वादे के अनुरूप दस लाख सरकारी नौकरियों देने की चुनौती केवल उन्हीं के सामने नहीं होंगे, बल्कि यह एक ऐसा मुद्दा बन जाएगा, जिसका असर तमाम दूसरे राज्यों तक पहुंच जाएगा। युवाओं का समर्थन बढ़ाने के लिए दूसरे दलों को भी अपने राज्यों में सरकारी नौकरी का वादा करना ही होगा। युवाओं के सामने एक नजीर बन गया होगा कि बिहार में अगर वहाँ की सरकार ऐसा कर सकती है तो फिर हमारे राज्य में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है? बिहार में ही तेजस्वी की घोषणा के बाद एनडीए और खासतौर पर बीजेपी किस तरह से दबाव में आई, उसका उदाहरण देखा गया है। तेजस्वी ने जब दस लाख सरकारी नौकरियों का वादा किया, तो पहले बीजेपी और ज़ीयू ने उसका संज्ञान लेना भी जरूरी नहीं समझा। फिर उसके असर होते हुए देखा तो यह कहकर उसे खारिज करने की कोशिश की कि इस घोषणा पर अमल हो ही नहीं सकते, क्योंकि इसके लिए राज्य को लगभग 1.11 लाख करोड़ रुपयों की अतिरिक्त जरूरत होगी, और इतनी बड़ी रकम जुटा पाना मुमकिन नहीं।

तेजस्वी ने इसका जवाब दिया कि खर्च में कटौती करेंगे और महसूस करने की जरूरत है, मंत्रियों-विधायकों का वेतन कम कर देंगे। उसी समय राज्य में बीजेपी को यह अहसास हो गया था कि हाथ से बाजी निकले, उससे पहले कुछ करना चाहिए। बीजेपी ने भी अपने संकल्पपत्र में 19 लाख युवाओं को रोजगार देने की बात कही। बिहार के नतीजे आने के अगले छह महीने के अंदर चार प्रमुख राज्यों- वेस्ट बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में राज्य विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। सबसे पहले इन्हीं राज्यों में राजनीतिक दलों के सामने युवाओं के लिए सरकारी नौकरी देने का वादा करने का दबाव देखा जाएगा